Category: चेतना –


चेतना —

क्षमा स बैढक कोनो  दान नै !

दान स बैढक कोनो सेवा नै !
सेवा स बैढक कोनो कर्म नै !
कर्म स बैढक कोनो धर्म नै !
धर्म स बैढक कोनो सत्य नै !
सत्य स बैढक कियो नै ………..सत्य ईश्वर छिएक ….ईश्वर सत्य छिएक !
(नविन ठाकुर )
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  • जेकर

आँखी में ……………सपना के बोझ
ठोर पर ………………झुठ्क बोझ
ह्रदय में ……………..इर्ष्या के बोझ
जुबान पर ……………कुट्चाली के बोझ
मस्तिस्क में ……….. दुर्विचारक बोझ
हाथ में ………………हिंसा के बोझ
एतेक बोझ लक भला एगो मनुष्य कोना ख़ुशी स जीवन व्यतीत क सकैत अछि ? कोना मुस्करा सकैत अछि? कोना भगवत भक्ति क सकैत अछि ? कोना सत्य बजी सकैत अच्छी ? कोना सद्विचार भ सकैत छैन ? कोना प्रेम क सकैत छैथ ?………

चेतना –

  • अगर आन्हा के पड़ोसी के ऊपर अत्याचार भ रहल अछि, आ आन्हा चैन स सुतल छि त त याद रखु अगला नम्बर अंहि के आब वला अछि !
  • जे व्यक्ति आन्हा के सामने ककरो दोसर साथे झूठ बाइज रहल अछि ओ मौका एला पर आँहु के साथे झूठ बाइज सकैत अछि !
  • मनुष्य के अपन दुखक मात्रा कनियों रहैत बेसी बुझाय छै , सुखक मात्रा बेसी रहितो कमे बुझी परैत छै …..याह मनुष्यक प्रकृति छै !
  • मनुष्य के लेल सिद्धान्तवादी भेनाय ठीक छई मुदा रुढ़िवादी भेनाय मानव मात्र नै बल्कि देश -काल के विकास के मार्ग में सेहो रोरा होईछै !
  • दान ओकरे दी जे दान के पात्र हुवा , नै त दान केला के कोनो फल नै ! अघाल व्यक्ति के आगू में भोजन परोसने जियाने हयात !
  • तीव्र इच्छा शक्ति आ सकारत्मक सोच ई दू गो चीज मनुष्य के लक्ष्य प्राप्ति के लेल ठोस आधार स्तम्भ के सामान छै , ई दुनु में सं एकौटा के नई रहला पर लक्ष्य प्राप्ति असंभव अछि !
  • जे व्यक्ति जिनगी में कोनो गलती नई केने हेता ओ जिनगी में किछु नई सिखने हेता , और जे सिखने हेता ओ कखनो गलती नई करता !
  • जाही घर में आपसी प्रेम आ शांति नहीं होयत अछि ओ घर नर्क के सामान होयत अछि ……..जत एको दिन ठहरनाय असंभव होयत अछि !
  • ईश्वर सँ भौतिक पदार्थ के कामना केनाय अपन पैर पर कुरहैर मारनाय के सामान अछि !
    क्षणिक सुख लेल एगो ज्ञानियों मनुष्य अज्ञानी बैन जाईया जे परम सुख त्यागी नश्वर सुख लेल लालायित रहैया !
  • शिक्षा — आ — संस्कार – ई दुटा मनुखक एहन गुण छिएक जाही सँ ओ मनुख कहबैत अछि अई दुटा गुण स रहित ओ एगो जिव मात्र अछि !
  • जे व्यक्ति परिस्थिति के अनुकूल अपना आप के ढाइल पाब में सक्षम होयत छैथ ओ सबहक प्रिय होयत छैथ …आ असल में वाह समाज के मार्गदर्शी बैन सकैत छैथ !
  • सच बजनाय मनुष्यक स्वभाविक आचरण छिएक जखन की झूठ बजनाय एगो कला छिये जे सबहक बस के नै छई ……….सब कहैत छै जे सच बाज लेल हिम्मत आ साहस चाहि , मुदा हम कहैत कहित छि जे झूठ बाज्क हेतु हिम्मत -साहस चाहि !
  • इर्ष्या आ द्वेश व्यक्ति के बुद्धि के विकाश में बाधक होयत अछि !
  • आस्था आ विश्वास के बेगर साधना केनाय ढोंग अछि ….. !
    जाही सं फलप्राप्ति के कोनो उम्मीद रखनाय समय के नस्ट करब छि !
  • विवेक सँ हिन् बुद्धिमानो मनुख मुर्ख सामान होयत अछि, जेना म्यान के बिना तलवार !
  • जे वस्तु आ व्यवहार आन्हा अपना प्रति चाहैत छि …..ओ वस्तु आ व्यवहार दोसरो के लेल चाहि क देखियो , आन्हाके अपना लेल कहियो मांग के आवस्यकता नई परत !
  • भोग -विलाश मनुष्य के दुःख के मूल कारन छिएक !
  • विश्वास के टुटला पर ओकर जगह शक ल लैत छई जे एगो भयंकर मानसिक रोग होयत छई ……..जे व्यक्ति के लक्ष्य प्राप्ति में सबसँ बाधक चीज छिएक , और एकर हानि जीवन में दुनु व्यक्ति के उठब परैत छैक …..भरोसा तोर वला के आ भरोसा कर वला के , तहिदुवरे केकरो भरोसा आ विश्वास तोरला सँ पहिने एक बेर भविष्य में हुव वला नुक्सान पर अवस्य विचार करबाके…!
  • आई के ई बहुलता आ चकाचौंध दुनिया में अपन जरुरत के सिमित रखनाई सिखु नई अंत में कस्ट के सिवाय किछु नई भेटत !
  • अध्यात्मिक ज्ञान के बिना विद्या विष के सामान होयत अछि ……जेना छुरी कतबो धरगर रहा , मुठरा के बिना खतरनाक होयत अच्छी !
  • मनुष्य अपन जाईत सँ नई बल्कि अपन कर्म सँ पैघ कहबैत अछि !
  • सब स पैघ साधक वाह अछि जे अपन इन्द्रिय के अपन वस् में रखने अछि ! जग में सब स बरका साधना याह छि ई स पैघ कोनो साधना नै संसार में !
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