प्रीतम उवाचः —

कहलोउ अबै छि चारी दीन में, आई भ गेल एक महिना

सच कहैत छि प्रिये महग पड़ल आन्ह्के नैहर गेना

कत कराही कत अछि चम्मछ ,भेटेया नै एकोटा कटोरी

नून, मिरचाई ,मस्साला , मेथी कत धेने छि हिंग अदौरी

हांसू, पलेट ताकि क थकलौ , की जानी सबटा कत नुकेलोऊ

बड-बड मौगी के हम देखलूं आन्हा एहन मुदा कतोउ नै पेलौ !!

भोरे सँ हम लागी परल छि, नही बनल एखन तक खाना

सच कहैत छि प्रिये महग परल आन्ह्के नैहर गेना !

आलू कोबी बैगन भिन्डी सबटा बुझी परैया अनचिन्हार

मितक- मित एकैगो भेटल टुक-टुक तकैत आमक आचार

सबटा भंसा घर छिरिया का देखलौ नहीं भेटल चाहियक छना

सच कहैत छि प्रिये महग पड़ल आन्ह्के नैहर गेना !

किछ दिन एनाही रहल त भ जायब हम स्वर्गवासी

जल्दी सँ आन्हा गारी पकडू हे घट- घट के घरवासी

जुनी विलम्ब नहीं करू आ नई करू कोनो बहाना

सच कहैत छि प्रिये महग पड़ल आन्ह्के नैहर गेना !