Category: कविता –


आई पवन वेग में चली रहल,
नव अंकुर मन में पली रहल !

अछि फ़ूकबा के गुंजाइस नै ,
आब उड़बा के फरमाईस नै !

पलव्वित करी एही अंकुर के,
माया छोरी क्षण भंगुर के !

कलकल प्रेमक निरवता सँ
मन चंचल वेग समीरता सँ

सिंचन करी एही विटपता के
चित साधु संत सहजता के

एक दिवस महा वट वृक्ष बनै
ता पर नाना मधु पुष्प खिलै

प्रेमक पाश में बाँधि अपन
मधु के ललसा में भय मगन

दुश्टो सब अपन सुइध हेरय
भंवरा बनि अपने पंख चिरय

द छाया अपना आँचल के
एही माया मृग सँ बाँचल जे

निस्वार्थ भाव् नीर बहैत रहा
जग्भर्मित पथगामी पिबैत रहैए

मधु सन माधुर्य सुधामय जग
लय सुख – दुःख के मेथैत रहैए

जीवन संझा आब ढैल रहल
अंकुर के बीज फेर पनैप रहल !

आई पवन वेग में चली रहल, !!

( नविन ठाकुर)

प्राप्ति —

किया रहितो सब किछ ,
कुछी के कमी खलैया जिनगी में !
कुछी के पूरा भेला पर
तैयो रैहजैया कुछी कमी जिनगी में !
समटैत आगू ,राखैत पाछू ,
सबटा छुइट गेल पाछु जिनगी में !
नै कुछी बांचल पाछू तैयो
कियो पाछू छोरलक नै जिनगी में !
आब हमहूँ पाछू -२ घूमी
किनकर घूमी सोचैत छि जिनगी में !
ठईन लई छि जकरे पाछू
कैलह बदनाम भ जाइय जिनगी में !
अपने सोच के पाछू फेर
पुछई छि सभक सहमती जिनगी में !
नीक-बेजाय कुछी कहैया
कुछी खीचैया टांग पाछू जिनगी में !
ककरा की कहियो सब त
अछि अपने चिन्हार पाछू जिनगी में !
सभक दोष अपने शिर ल
कह्बेलहूँ दोषी बरका आए जिनगी में !

हे यउ ओ छलाह मिथिला वासी

रंग अद्भुत ढंग अद्भुत

खान पानक सचार  अद्भुत

वस्त्र अद्भुत सस्त्र अद्भुत

वेद हुनकर मित्र अद्भुत

सिद्धि प्रसिद्धि छल हुनक दासी

हे यौ ओ छलाह मिथिला वासी !!

भासा के जुनी करू बखान

जिनक पसंदी पान मखान

मिथिला भूमि हुनक अभिमान

जाहिठाम सीता भेली महान

समय चक्र के देखू रासी

हे यौ ओ छलाह मिथिला वासी !

दृष्टी बदलल ज्ञान बद्लिगेल

रंग रूप और नाम बद्लिगेल

हमर मानो हुनका आपमान लागैत छैन ,

दू दिन में हुनकर शान बद्लिगेल

पोथा -पोथी के देला त्यागी

अंग्रेजी के भेला दासी

हे यौ ओ छलाह मिथिला वासी !

जागु मैथिल मिथिला वासी

वासी भ नै बनू सन्यासी

अपन रीति के ज्योति जलाबू

मिथिला के अंधकार मेटाबू

लिय संकल्प बनू अभिलाषी

ज होई सच्चा मिथिला वासी !

आँचर –

आँचर –

चिंता के चिपरी जेना पथैत…
बेटी के संग गोटरस खेलैत …आँचर !

अपन इच्छा के रोटी बेलैत
स्वाद प्रेमक घर में परसैत …आँचर !

मतभेद के आँचर में बन्हैत
परिवार के आंगन में समटैत….आँचर !

मोनक भेद के गांठ सोझरबैत
बैन गेंदा फुल आंगन गमक्बैत…आँचर !

अपना मोन के अपने मनबैत
स्नेह्पर त्याग्क ओढ़नी फ़हरबैत…आँचर !

अनंत काल सं रिश्ता जन्म्बैत
गर्भगोदी सं ब्रम्हांड रचना करैत ….आँचर !

ल रिमोट के हाथ में देखू
आब बैन गेलहुं ओपरेटर
हमरे अछि भिसियार टीबी,
हमरे अछि जनरेटर !

हमरे हाथ में दुनियां अछि ,
सब हमर हाथक कठपुतली,
जिम्हर घुमेबई ओम्हरे घुम्तई
अछि हमरा हाथ में शुतली !
ओतबे चलतै, जतेक दबेबई
पैर तरक एक्सलेटर,
ल रिमोट के हाथ में देखू
आब बैन गेलहुं ओपरेटर !

कुकुर सन अध्मौगैत सब दिन
मुदा आई बनल छि ढीठ,
अन्हरा कुकुर माड़े तिरपित,
चटैत पुलौसी खीरक मीठ !
गैढ़ पढैया की आदर दैया
सब मिल कहै भप्लेटर
ल रिमोट के हाथ में देखू ,
आब बैन गेलहुं ओपरेटर !

मोन भेटल अछि भरना पर
नै अपना पर अछि काबू,
हमरा सन नै काबिल कियो ,
नै हमरा लग कियो बाबु !
चढल गुमान मुहं छुटल लगाम
लिखैछी मोन के लवलेटर
ल रिमोट के हाथ में देखू ,
आब बैन गेलहुं ओपरेटर !

-:  काल-दिशा   :-

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ

तैयो समय नै भेटल हमरा,
एखनो समय सँ लैर रहल छि …/२/
अपनों सँ अल्गेलक हमरा !
दियादी फैंटी में बैंटि रहल छि ….,
ततेक मोन भट्केल्क हमरा ,
समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ

तैयो समय नै भेटल हमरा,
मोन मसोरने हांफी रहल छि …../२/
भैर जिनगी दौरेलक हमरा ,
की पेलहूँ हम की छुटल अछि ….,
सब्किछ ई बिसरेलक हमरा !
समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,
भेलहुँ ज्ञानी समय अनुरूपे……/२/
तेहन पाठ पढेलक हमरा ,
भैर दुनियां के ज्ञान बंटई छि …..,
अपना सँ पिटबेलक हमरा !

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,
अंत काल समय फेर भेटल……/२/
काया साथ नै देलक हमरा ,

जै काया लेल समय गवेलहूँ…..,

समय साथ छोरबेलक हमरा !
समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,
(नविन ठाकुर )
अनुकम्पा –
ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा ,त  हमरो किछु  देनाय सिख्बाके !!
अपन हित त पशुओ जिबैया,अनकर हित जिनाय सिख्बाके !!
हवा ,प्रकाश, धरती, दैया,भैर दैया मेघ समूचा खेत में पानी !
जदी बदला में हम किछु नै देलिए ,त  ई भेल बरका बैमानी !
एही स जे हम दुःख भोगैछी , दुःख के दूर भगेनाय सिख्बाके !
ईश्वर  दैया  सब्कुछी हमरा ,त  हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! !
जरैत  धरा  पर  चलैत पथिक के, गाछो  दैया सब्दीन छाया  !
अपन  फल  अपने नै  खा क , सब जिव  के  जुरबैया काया !
प्रभु के पहिने भोग अर्पण क, पश्चात अपने भोजन करबाके  !
ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा , त हमरो किछु देनाय सिख्बाके  !!
अनपढ़ के बिन दान पढाबू ,भूखल प्यासल के भोजन कराबू !
बुढ- पुरान, समाज के सेवा , मात,पिता, गुरु आज्ञा स्विकारू !
जे किछु भेटल अछि ईश्वर स , हमरा ओ बाँटनाय सिख्बाके !
ईश्वर  दैया  सब्कुछी हमरा ,त  हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! !
मानव तन अति दुर्लभ अछि भेटब ,एकरा मैल रहित  बनाबू !
गमक पसारू फुल सन संउसे ,ज्वलित दीप स अन्हार मेटाबू !
धन्य भाग एही मानव तन के ,आब  नै मौका  फेर चुकबाके !
ईश्वर  दैया  सब्कुछी हमरा ,त  हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! !
अपन हित त पशुओ जिबैया,अनकर हित जिनाय सिख्बाके ! !
( नविन ठाकुर )

अस्तित्व –

हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल !
जे कुछी अपना संग अछि सबटा अछि अनकर देल

देब बला देलक ओहो, देलक अपना शान स
हमर अछि ई लेब बला कही उठल अभिमान स
मोनक बात सुन वला मोन ककरो अनकर देल
हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल !

जे संग अछि एखन तक ,ओ सैदख्न रैह सकैया नै
कखन बिछुइर जायत लग स ई कियो जनैया नै
जिनगी के उपजल मधुबन अछि ककरो अनकर देल
हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल !

जग के सेवा खोज अपन प्रीत ओकरे स करू
जिनगी के गूढ़ अछि, बिन बुझने कस्ट नै करू
साधना के राह में साधन अछि अनकर देल
हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल !

( नविन ठाकुर )

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वियोग –

वियोग –

केलहुं कतेको प्रयत्न,किया सुनैया नै
राइत बीतल मुदा निन किया अबैया नै
कनैया रैत – रैत भैर मोन हमर
धैर आइंख स नोर बहैया नै !

सोचै छि सब्दीन आई सुतब चैन स
ओईढ चदैर आई एरी तक तैंन क
पैर पसारे छि जखने पूरा
फाटल चदैर पैर तक पुरैया नै !

देख अचंभित छि हम अपने आप के
दोख अनकर कहू की अपन कपार के
टूटल भरोसा जे छल आन पर
आब त अपनों पर भरोसा होइया नै !

मन्ल्हूँ छल हमरो ख़ुशी ओकरे ख़ुशी में
मुदा हमरो त हंसी छल ओकरे हंसी में
प्रेम केलहुं दिल के मज़बूरी पर
मुदा प्रेम कहियो मजबूर भेलैया नै !

( नविन ठाकुर )

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जाढ़ ( एगो अनुभूति )

आयल सिहरैत सिस्कैत सुग्बुगैत कुन कोण स !
नै जानी आयल कहिया अन्हरिया आ  इजोर स !
केलक गुदगुदी एना याद परल  पिछला शाल !
कोण भोज खेने रही याह ठंडी में ओढ़ने दुशाल !
पितमर काका के भोज पोरका भेल रहा अनमोल !
उझैल देलकैन पैन कियो पोनतर मैचगेल अनघोल !
ठिठुरैत छल पैर हाथ , मिल करैत छल सब घुर !
घुर तर बैस क , सब   गनैत  छल  गामक  बुढ
कतेक छोऊ बुढ गाममे  जग्तोऊ कतेक  भोज !
फलना के बरखी के आब गणले छऊ दिन सोझ !
भोरका पहर में कहियो ओछेन नै छोरल जाएत छल !
मारने रहित्हूँ गबदी चाहे कतबो बाबु डिरियात छल !
स्कुल जेबाक लेल सब्दीन मैरतहूँ बहाना !
बाबु के डरे माँ लग पसारैत छलहूँ घाना !
जाढ़क महिना में भरल सबहक घर बखारी !
भोरे क खाऊ सब्दीन भात-अलुकोबी तरकारी !
ओना त सब दिन हमरा जार बढ होयत छल !
मुदा तिला –सकरैत दिन चुरलाई पर भर छल !
ससरैत-भोरहरबा में मुस्की मारैत निकेल गेल !
फगुवा के अबिते ने जानी कत फेर ससैर गेल !
जाहिठाम स आयल, ओहिठाम फेर चैल गेल !
अबैतछि अगला साल कैह याद अपन छोइर गेल !

( नविन ठाकुर )
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